यादों का सैलाब
सर्द रातों में ठिठुरते हुये जब तानी तुम्हारी यादों कि चादर तब तपती आग सी गर्माहट जला गई जिसम को मेरे अब न उस चादर को ओढे बनता है. न उंघाढे और जिस्म का एक एक रोयां बहने लगा है, तुम्हारी यादों का सैलाब बन के...